एक दिन चीन की दीवार को मात देगी भ्रष्टाचार की इमारत
*एक दिन चीन की दीवार को मात देगी भ्रष्टाचार की इमारत*
मुंशी प्रेमचंद ने 'नमक का दरोगा' में लिखा है 'ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्तप्राय हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है।' उपन्यास सम्राट का यह कथन आधुनिक युग में अक्षरश: प्रासंगिक है। इस कहानी को मुंशी प्रेमचंद ने बीसवीं सदी (1925) में लिखा था जिसमें समाज में व्याप्त ऊपरी कमाई (घूस, शुल्क) का बड़ा ही सच्चा चित्र उकेरा है। जब यह कहानी मुंशी प्रेमचंद ने लिखी थी तब अंग्रेजों का शासन हिंदुस्तान पर था। भारत की अर्थव्यवस्था अंग्रेजों के अधीन थी। अंग्रेजों के शासनकाल में जो भारतीय अधिकारी उच्च पदों पर थे उनका वेतन अच्छा था किंतु अधीनस्थ व छोटे पद पर कार्यरत कर्मचारियों का वेतन न्यूनतम होता था। गरीबी, शिक्षा तथा खाद्यान्न की कमी ने भारत को जकड़ रखा था। यद्यपि मालगुजारी, जमीदारी, लगान की प्रथा पहले से ही विद्यमान थीं लेकिन अंग्रेजों ने इसमें परिवर्तन कर किसानों, कामगरों का शोषण करना आरंभ कर दिया। किसानों से जबरदस्ती लगान वसूल किया जाता था और न देने पर उन्हें प्रताड़ना व यंत्रणा दी जाती थी। अंग्रेजों के शासनकाल से ही भारतवर्ष में भ्रष्टाचार की जो नींव पड़ी वह बढ़ते-बढ़ते आज चीन की दीवार को मात दे रही है। भ्रष्टाचार आज हिंदुस्तान के हर विभाग में अपने चरमोत्कर्ष पर है। भ्रष्टाचार के अनेक रूप है यथा -कालाबाजारी, चोरबाजारी, रिश्वतखोरी, मुनाफाखोरी, घूस, जबरन वसूली, कमीशनखोरी, खर्चा- पानी, सेवा- शुल्क, सुविधा -शुल्क, ऊपर का हिस्सा, घोटाला आदि। हर रूप में भ्रष्टाचार समाज व सरकारी विभागों में व्याप्त है। भ्रष्टाचारी व्यक्ति को नैतिकता व आदर्श से कोई सरोकार नहीं होता है। वह तो ऊपरी कमाई करके जल्द से जल्द धन बटोर कर भौतिक सुख-साधनों से संपन्न हो जाना चाहता है। जब पैसे रूपी उदर की जरठाग्नि प्रज्वलित हो जाती है तब मनुष्य माफिया और डॉन बन जाता है। उत्तरप्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री आदित्य योगी नाथ जी की सरकार बुलडोजर चलवाकर इनकी संपत्ति को (काली कमाई को) कुर्क रही है और माफिया डॉन जमींदोज हो गए हैं। माफिया, डान बनना अतिवृहद स्तर का भ्रष्टाचार है और इनके भ्रष्टाचार की व्याप्ति वैयक्तिक और सरकारी दोनों ही स्तरों पर होती हैं।
किन्तु आज हिंदुस्तान में सरकारी, गैर सरकारी व अर्द्ध सरकारी प्रत्येक विभाग में नीचे स्तर से लेकर ऊँचे स्तर तक भ्रष्टाचार व्याप्त है। चिकित्सा के क्षेत्र में कमीशनखोरी, जांच, एक्सरे, दवाईयों तक में है। चिकित्सकों की तिजोरियों में कुबेर स्वयं विराजमान है। मरीज उपचार के लिये फीस तो देते ही हैं साथ ही उपचार के बदले एक्सरे, जांच, दवाईयों के कमीशन भी उन्हें दिलवाते हैं। आप सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त हुए तो पेंशन प्राप्ति हेतु कार्यरत विभाग के साथ ही पेंशन विभाग को भी मोटी रकम सेवानिवृत्त निरीह जीव अदा करता है, तब उसे पेंशन मिलती है। आप मकान की रजिस्ट्री कराने जाइए, रजिस्ट्री ऑफिस में मोटी रकम दीजिए। भ्रष्टाचार रूपी दानव ने हर विभाग में दलालों को जन्म दे दिया हैं। विभाग में जाते ही ये मक्खियों की तरह आपके चारों ओर घूमने लगेंगे। मकान का दाखिल खारिज कराने जाइए वहाँ कर निरीक्षक पीला कार्ड देने हेतु आपसे रकम वसूल करेगा। रकम वसूली की दर निश्चित नहीं होती जैसा आसामी होता है उससे वैसे ही रकम वसूल की जाती है। बिजली विभाग में नया कनेक्शन लेने जाइए, मीटर लगवाइये या पुराना मीटर बदलवाइए वहाँ भी चढ़ावा चढ़ाए बिना काम नहीं चलता है। आजकल तो न्यायालय के न्यायाधीश तक मोटी रकम (कुबेर का खजाना) लेकर फैसला बदल देते हैं। कचहरी का पेशकार मात्र बीस रुपये लेकर ही आपको केस की तिथि बतायेगा। फ़ाईल निकालने वाला बाबू, चपरासी ये सब छोटे जीव अल्पराशि लेकर आपका काम कर देते हैं। सिंचाई विभाग में गांव किसान यदि ट्यूबवेल लगवाने के लिए जाता है उसे वहाँ भी विभाग में भेंट चढ़ानी होती हैं। बांधों के निर्माण में उच्च अधिकारी से लेकर निचले स्तर के कर्मचारी अपनी जेबें भरते हैं। जल, थल, वायु सेना के हर विभाग में कमीशनखोरी है। पुलिस विभाग तो सदियों से सबसे ज्यादा भ्रष्ट विभाग माना जाता रहा है। जबरन वसूली करने में इन्हें महारथ हासिल है। पुलिस विभाग के प्रत्येक विभाग के कर्मचारी व अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं। होते तो ये हैं समाज के रक्षक पर बन जाते हैं भक्षक। नगर निगम, नगरपालिका बनाम नरकपालिका के तो कहने क्या? लाखों, करोड़ों रुपए बरसात से पहले नालों की सफाई, सड़कों की मरम्मत, कूड़ा प्रबंधन के लिए आते हैं पर सब ढाक के तीन, ये कुछ काम नहीं करते हैं बस कागजी कार्रवाई कर अपनी तिजोरियां भरते हैं। जनता जाए भाड़ में उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। सरकारी विभागों में जहां-जहां सामानों की खरीददारी होती है वहां हर विभाग में एक वस्तु के बिल बढ़ा- चढ़ाकर बनाए जाते हैं। सरकारी नियुक्तियों में घोटाले भी भ्रष्टाचार की देन है। हमारे देश में बड़े-बड़े घोटाले हुए हैं - बोफोर्स घोटाला, स्टॉक मार्केट घोटाला, दूरसंचार घोटाला, यूरिया घोटाला, चारा घोटाला। बिहार के मुख्य मंत्री लालू प्रसाद यादव का चारा घोटाला सुप्रसिद्ध है। भारत के महालेखाकार कार्यालय के जितने भी कर्मचारी ,अधिकारी ऑडिट करने के लिए किसी भी सरकारी विभाग में जाते हैं वे वहां से मोटी रकम लेकर ही सारे घपले को क्लीन चिट दे देते हैं।
देश के विकास तथा जनता की सुविधा के लिए देशभर में हाईवे, सड़कें, पुल, फ्लाई ओवर, सबवे के साथ-साथ हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन सँज सँवर रहे हैं। विडंबना यह है कि ज्यादातर सड़के पहली ही बरसात में धंस जाती है और जगह-जगह गड्ढे हो जाते हैं। इस वर्ष बिहार के सिवान, सारण, किशनगंज को मिलाकर कुल छ: पुल ध्वस्त हो गए। लखनऊ हाईवे पर जलालपुर पुल में दरार आ गई। जो पुराने पुल थे उनकी मरमत नहीं की गई जो नए थे , वे मानकों के अनुसार निर्मित नहीं थे। दिल्ली में भारी बरसात के कारण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की एक छत गिर गई। जबलपुर हवाई अड्डे की छत गिर गई। राजकोट हवाई अड्डे की छत गिर गई। इन दोनों हवाई अड्डों का लोकार्पण हाल ही में किया गया था। पुलों, सड़कों, हवाई अड्डों की घटना यह बयां करती है कि सरकारी एजेंसियां दोयम दर्जे का निर्माण कार्य करवा रही है। विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि अंग्रेजो के जमाने के बनाए गए सारे पुल अभी तक सही सलामत है लेकिन वर्तमान सदी के पुल ढहे जा रहे हैं। इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि निर्माण कार्य घटिया स्तर का किया जा रहा है। निर्माण कार्य में निर्धारित मानकों का ध्यान न रखने का प्रमुख कारण भ्रष्टाचार है। यह भ्रष्टाचार भी दो प्रकार से किया जाता है कभी यह भ्रष्टाचार नेताओं और नौकरशाह दोनों द्वारा मिलकर किया जाता है। कई बार नौकरशाहों के द्वारा किया जाता है। रिश्वतखोर नौकरशाह, सरकारी अभियंता भ्रष्ट ठेकेदारों को ठेका दे देते हैं और फिर घटिया स्तर का निर्माण कार्य करवाते हैं। हर प्रकार के निर्माण कार्य में दलाली, रिश्वतखोरी, कमीशनखोरी का हिस्सा बंधा होता है। बिना इसके धनराशि का भुगतान नहीं होता है। ऐसा नहीं है कि इन बातों से सरकारें अनजान होती है बल्कि उन्हें तो अपनी सत्ता को बनाए रखना होता है।
सरकार की ओर से गरीबों के लिए जितनी योजनाएं लागू की जाती हैं उनका लाभ लेने के लिए गरीब बेचारे को कमीशन देना होता है। प्रधानमंत्री आवास योजना, हर घर शौचालय योजना में भी गरीबों को पैसा ग्राम प्रधान, सरपंच को देने के पश्चात ही वे योजना का लाभ ले पाते हैं। सभी घोटालों, भ्रष्टाचारों पर राजनीतिक दल अपनी -अपनी रोटियां सेकते हैं। विपक्ष पार्टी दूसरे पर कीचड़ उछालती है। इसका स्थायी समाधान नहीं निकलते हैं। हो हल्ला के कुछ दिनों बाद सारा मामला ठंडा बस्ते में चला जाता है।
'नमक का दरोगा' में ही मुंशी प्रेमचंद ने लिखा है 'आदमी तथा अवसर देखकर घूस लेना' जो भ्रष्टाचारी इसका ध्यान रखते हैं वे कभी पकड़े नहीं जाते हैं और जिनसे चूक हो जाती है वे पकड़ लिए जाते हैं। हम प्रतिदिन समाचार पत्रों में पढ़ते हैं कि घूस लेते कानूनगो, लेखपाल, दरोगा, पुलिस अधिकारी, बैंक अधिकारी, बाबू पकड़ा गया। सरकारी हर विभागों का अवलोकन करने के बाद हम कह सकते हैं कि हिंदुस्तान की नब्बे प्रतिशत जनता भ्रष्ट है केवल दस प्रतिशत भ्रष्टाचार से परे हैं जिन्हें समाज, घरवाले, बाल-बच्चे, मूर्ख और पागल कहते हैं। सरकार की ढुलमुल नीति के कारण भ्रष्टाचार की इमारत बुलंद हो रही है।
भ्रष्टाचार को यदि रोकना है तो दंड व निर्णय की त्वरित व्यवस्था होनी चाहिए। ईमानदार अधिकारी को प्रोत्साहन व पुरस्कृत करना चाहिए। नेताओं तथा अधिकारियों के अनुचित हस्तक्षेप पर रोक लगाना चाहिए। नेताओं को कुर्सियों के मोह को त्यागना चाहिए। भुगतान की सारी प्रक्रिया आनलाइन हो। तब शायद भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सकती है।
*प्रो. डा. वत्सला*
*वाराणसी (उ.प्र.)*
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