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क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता से साहित्य सर्जन संभव है

 क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता से साहित्य सर्जन संभव है आधुनिक युग में मानव का जीवन नई-नई तकनीकों पर विशेष कर कंप्यूटर पर आश्रित हो गया है। कंप्यूटर और मोबाइल के बिना जीवन असंभव सा प्रतीत होने लगता हैं। हमें अपने दैनिक जीवन में पग- पग पर अब कंप्यूटर की आवश्यकता होती है। इसीलिए कंप्यूटर को बुद्धिमान बनाना अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता कंप्यूटर का सिद्धांत और विकास है, जो मानव बुद्धि और इंद्रियों का अनुकरण व अनुसरण करता है । कृत्रिम बुद्धिमत्ता मशीनों के पास विद्यमान वह बुद्धिमता है जिसके द्वारा वे मानवीय सहायता से कई प्रकार के कार्य कर सकती हैं। इसके सहयोग से मशीनें सीख सकेंगी, समस्याओं को सुलझा सकेंगी, कार्यों की योजना बना सकेंगी, सोच सकेंगी। कृत्रिम  बुद्धिमता  से तकनीक की दुनिया में एक क्रांति आएगी ऐसी संभावना की जा रही है। इस तकनीकी से युगांतकारी परिवर्तन होगा। जब भी कोई नया आविष्कार या नई तकनीक अन्वेषण के उपरांत प्रयोग में आती हैं तब उसके विषय में नाना प्रकार की अटकलें लगाई जाती हैं। यह तकनीकी संक्रमण काल में विद्यमान है जहां पुरातन को त्यागना और नवीन क...

हिन्दी और आजीविका*

 ,             *हिन्दी और आजीविका*           प्रायः जब हिंदी और आजीविका पर चर्चा होती है तो लोग निराशाजनक उत्तर देते हैं। हिंदी को पढ़ना शायद वे अपराध बोध समझते हैं ।अधिकांश लोगों की सोच ऐसी होती है कि जिसे कहीं प्रवेश नहीं मिलता या जो विज्ञान पढ़ने में असफल हो जाता है, अंततोगत्वा वह हिंदी साहित्य के अध्ययन की ओर उन्मुख होता है। बहुधा लोग कहते हैं कि हिंदी पढ़कर क्या होगा? कौन सा रोजगार मिलेगा? लेकिन ऐसी सोच रखने वालों को इस बात का आभास नहीं होता है कि हिंदी को विधिवत अधीत करने वाला विद्यार्थी कभी आजीविका विहीन नहीं हो सकता है। उसे अपनी जिंदगी के भरण- पोषण का अवसर कहीं ना कहीं मिल जाता है।           संस्कृत के बाद हिंदी भाषा में ही हमारी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक,  ऐतिहासिक,  राजनीतिक, विरासत सुरक्षित हैं। इसके साथ ही लोककथाएं, लोककला ,लोकाचार  लोकपरंपरा सब सुरक्षित व संरक्षित है हिंदी भाषा के प्रति बड़े-बड़े महापुरुषों, वैज्ञानिकों राजनीतिज्ञों, फिल्मकारों तथा अशिक्षित व्यक्...

एक दिन चीन की दीवार को मात देगी भ्रष्टाचार की इमारत

 *एक दिन चीन की दीवार को मात देगी भ्रष्टाचार की इमारत*           मुंशी प्रेमचंद ने 'नमक का दरोगा' में लिखा है 'ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्तप्राय हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है।' उपन्यास सम्राट का यह कथन आधुनिक युग में अक्षरश:  प्रासंगिक है। इस कहानी को मुंशी प्रेमचंद ने बीसवीं सदी (1925) में लिखा था जिसमें समाज में व्याप्त ऊपरी कमाई (घूस, शुल्क) का बड़ा ही सच्चा चित्र उकेरा है। जब यह कहानी मुंशी प्रेमचंद ने लिखी थी तब अंग्रेजों का शासन हिंदुस्तान पर था। भारत की अर्थव्यवस्था अंग्रेजों के अधीन थी। अंग्रेजों के शासनकाल में जो भारतीय अधिकारी उच्च पदों पर थे उनका वेतन अच्छा था किंतु अधीनस्थ व छोटे पद पर कार्यरत कर्मचारियों का वेतन न्यूनतम होता था।  गरीबी, शिक्षा तथा खाद्यान्न की कमी ने भारत को जकड़ रखा था। यद्यपि मालगुजारी, जमीदारी, लगान की प्रथा पहले से ही विद्यमान थीं लेकिन अंग्रेजों ने इसमें परिवर्तन कर किसानों, कामगरों का शोषण करना ...

Bhu कि खुबसुरती

  हम भारतवासी अपना प्रेम बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय को समर्पित करते हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का कुलगीत (बीएचयू कुलगीत) यानी " मधुर मनोहर अतिव सुन्दर " भारतीय रसायनज्ञ और विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शांति स्वरूप भटनागर द्वारा लिखी गई एक कविता है। मदनमोहन मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रीगणेश 1904 ई॰ में किया, जब काशीनरेश महाराज प्रभुनारायण सिंह की अध्यक्षता में संस्थापकों की प्रथम बैठक हुई। 1905 ई॰ में विश्वविद्यालय का प्रथम पाठ्यक्रम प्रकाशित हुआ। जनवरी, 1909 ई॰ में  कुंभ मेले  में मालवीय जी ने त्रिवेणी संगम पर भारत भर से आयी जनता के बीच अपने संकल्प को दोहराया। कहा जाता है, वहीं एक वृद्धा ने मालवीय जी को इस कार्य के लिए सर्वप्रथम एक पैसा चन्दे के रूप में दिया।  ऐनी बेसेन्ट  जी काशी में विश्वविद्यालय की स्थापना में आगे बढ़ रही थीं। इन्हीं दिनों  दरभंगा  के राजा  महाराजा रामेश्वर सिंह  भी काशी में "शारदा विद्यापीठ" की स्थापना करना चाहते थे। इन तीन विश्वविद्यालयों की योजना परस्पर व...